Friday, April 13, 2018

श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

यर्ह्यालयेष्वपि सतां न हरेः कथाः स्युः ।
    पाषण्डिनो द्विजजना वृषला नृदेवाः ।
स्वाहा स्वधा वषडिति स्म गिरो न यत्र ।
    शास्ता भविष्यति कलेर्भगवान् युगान्ते ॥ ३८ ॥
सर्गे तपोऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः ।
    स्थाने च धर्ममखमन्वमरावनीशाः ।
अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्या ।
    मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः ॥ ३९ ॥

कलियुग के अन्त में जब सत्पुरुषों के घर भी भगवान्‌ की कथा होने में बाधा पडऩे लगेगी; ब्राह्मण,क्षत्रिय तथा वैश्य पाखण्डी और शूद्र राजा हो जायँगे, यहाँ तक कि कहीं भी ‘स्वाहा’, ‘स्वधा’ और ‘वषट्कार’ की ध्वनि—देवता-पितरों के यज्ञ-श्राद्ध की बात तक नहीं सुनायी पड़ेगी, तब कलियुगका शासन करने के लिये भगवान्‌ कल्कि अवतार ग्रहण करेंगे ॥ ३८ ॥
जब संसार की रचना का समय होता है, तब तपस्या, नौ प्रजापति, मरीचि आदि ऋषि और मेरे रूपमें; जब सृष्टि की रक्षाका समय होता है, तब धर्म, विष्णु, मनु, देवता और राजाओंके रूपमें, तथा जब सृष्टिके प्रलयका समय होता है, तब अधर्म, रुद्र तथा क्रोधवश नामके सर्प एवं दैत्य आदिके रूपमें सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की माया-विभूतियाँ ही प्रकट होती हैं ॥ ३९ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

कालेन मीलितधियामवमृश्य नॄणां ।
    स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः ।
आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां ।
    वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥
देवद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां ।
    पूर्भिर्मयेन विहिताभिरदृश्यतूर्भिः ।
लोकान् घ्नतां मतिविमोहमतिप्रलोभं ।
    वेषं विधाय बहु भाष्यत औपधर्म्यम् ॥ ३७ ॥

समय के फेर से लोगों की समझ कम हो जाती है, आयु भी कम होने लगती है। उस समय जब भगवान्‌ देखते हैं कि अब ये लोग मेरे तत्त्व को बतलाने वाली वेदवाणी को समझने में असमर्थ होते जा रहे हैं, तब प्रत्येक कल्प में सत्यवती के गर्भसे व्यास के रूपमें प्रकट होकर वे वेदरूपी वृक्ष का विभिन्न शाखाओं के रूपमें विभाजन कर देते हैं ॥ ३६ ॥
देवताओं के शत्रु दैत्यलोग भी वेदमार्ग का सहारा लेकर मयदानव के बनाये हुए अदृश्य वेगवाले नगरों में रहकर लोगों का सत्यानाश करने लगेंगे, तब भगवान्‌ लोगोंकी बुद्धि में मोह और अत्यन्त लोभ उत्पन्न करने वाला वेष धारण करके बुद्ध के रूप में बहुत-से उपधर्मों का उपदेश करेंगे ॥ ३७ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट११)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट११)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

गोपैर्मखे प्रतिहते व्रजविप्लवाय ।
    देवेऽभिवर्षति पशून् कृपया रिरक्षुः ।
धर्तोच्छिलीन्ध्रमिव सप्तदिनानि सप्त ।
    वर्षो महीध्रमनघैककरे सलीलम् ॥ ३२ ॥
क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां ।
    रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन ।
उद्दीपितस्मररुजां व्रजभृद्वधूनां ।
    हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३ ॥
ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट ।
    मल्लेभकंसयवनाः कपिपौण्ड्रकाद्याः ।
अन्ये च शाल्वकुजबल्वलदन्तवक्र ।
    सप्तोक्षशम्बरविदूरथ रुक्मिमुख्याः ॥ ३४ ॥
ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः ।
    काम्बोजमत्स्यकुरुकैकयसृञ्जयाद्याः ।
यास्यन्त्यदर्शनमलं बलपार्थभीम ।
    व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५ ॥

(ब्रह्माजी कहरहे हैं) निष्पाप नारद ! जब श्रीकृष्ण की सलाह से गोपलोग इन्द्र का यज्ञ बंद कर देंगे, तब इन्द्र व्रजभूमि का नाश करने के लिये चारों ओरसे मूसलधार वर्षा करने लगेंगे। उससे उनकी तथा उनके पशुओंकी रक्षा करनेके लिये भगवान्‌ कृपापरवश हो सात वर्षकी अवस्थामें ही सात दिनोंतक गोवर्धन पर्वत को एक ही हाथ से छत्रक पुष्प (कुकुरमुत्ते) की तरह खेल-खेल में ही धारण किये रहेंगे ॥ ३२ ॥ वृन्दावनमें विहार करते हुए रास करनेकी इच्छासे वे रातके समय, जब चन्द्रमाकी उज्ज्वल चाँदनी चारों ओर छिटक रही होगी, अपनी बाँसुरीपर मधुर सङ्गीतकी लंबी तान छेड़ेंगे। उससे प्रेमविवश होकर आयी हुई गोपियोंको जब कुबेरका सेवक शङ्खचूड़ हरण करेगा, तब वे उसका सिर उतार लेंगे ॥ ३३ ॥ और भी बहुत-से प्रलम्बासुर, धेनुकासुर, बकासुर, केशी, अरिष्टासुर, आदि दैत्य, चाणूर आदि पहलवान, कुवलयापीड हाथी, कंस, कालयवन, भौमासुर, मिथ्यावासुदेव, शाल्व, द्विविद वानर, बल्वल, दन्तवक्त्र, राजा नग्रजित्के सात बैल, शम्बरासुर, विदूरथ और रुक्मी आदि तथा काम्बोज, मत्स्य, कुरु, केकय और सृञ्जय आदि देशोंके राजालोग एवं जो भी योद्धा धनुष धारण करके युद्धके मैदानमें सामने आयेंगे, वे सब बलराम, भीमसेन और अर्जुन आदि नामोंकी आड़में स्वयं भगवान्‌के द्वारा मारे जाकर उन्हींके धाममें चले जायँगे ॥ ३४-३५ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

यद्वै व्रजे व्रजपशून् विषतोयपीतान् ।
    पालांस्त्वजीव यदनुग्रहदृष्टिवृष्ट्या ।
तच्छुद्धयेऽतिविषवीर्य विलोलजिह्वम् ।
    उच्चाटयिष्यदुरगं विहरन् ह्रदिन्याम् ॥ २८ ॥
तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं ।
    दावाग्निना शुचिवने परिदह्यमाने ।
उन्नेष्यति व्रजमतोऽवसितान्तकालं ।
    नेत्रे पिधाप्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९ ॥
गृह्णीत यद् यदुपबन्धममुष्य माता ।
    शुल्बं सुतस्य न तु तत् तदमुष्य माति ।
यज्जृम्भतोऽस्य वदने भुवनानि गोपी ।
    संवीक्ष्य शंकितमनाः प्रतिबोधिताऽऽसीत् ॥ ३० ॥
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशात् ।
    गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।
अह्न्यापृतं निशि शयानमतिश्रमेण ।
    लोकं विकुण्ठ मुपनेष्यति गोकुलं स्म ॥ ३१ ॥

जब कालियानाग के विषसे दूषित हुआ यमुना-जल पीकर बछड़े और गोपबालक मर जायँगे, तब वे अपनी सुधामयी कृपा-दृष्टिकी वर्षासे ही उन्हें जीवित कर देंगे और यमुना-जलको शुद्ध करनेके लिये वे उसमें विहार करेंगे तथा विषकी शक्तिसे जीभ लपलपाते हुए कालियनागको वहाँसे निकाल देंगे ॥ २८ ॥ उसी दिन रात को जब सब लोग वहीं यमुना-तटपर सो जायँगे और दावाग्नि से आस-पासका मूँजका वन चारों ओरसे जलने लगेगा, तब बलरामजीके साथ वे प्राणसङ्कटमें पड़े हुए व्रजवासियोंको उनकी आँखें बंद कराकर उस अग्रिसे बचा लेंगे। उनकी यह लीला भी अलौकिक ही होगी। उनकी शक्ति वास्तवमें अचिन्त्य है ॥ २९ ॥ उनकी माता उन्हें बाँधनेके लिये जो-जो रस्सी लायेंगी वही उनके उदरमें पूरी नहीं पड़ेगी, दो अंगुल छोटी ही रह जायगी। तथा जँभाई लेते समय श्रीकृष्णके मुखमें चौदहों भुवन देखकर पहले तो यशोदा भयभीत हो जायँगी, परन्तु फिर वे सम्हल जायँगी ॥ ३० ॥ वे नन्दबाबाको अजगरके भयसे और वरुणके पाशसे छुड़ायेंगे। मय दानवका पुत्र व्योमासुर जब गोपबालोंको पहाडक़ी गुफाओंमें बंद कर देगा, तब वे उन्हें भी वहाँसे बचा लायेंगे। गोकुल के लोगों को, जो दिनभर तो काम-धंधों में व्याकुल रहते हैं और रात को अत्यन्त थककर सो जाते हैं, साधनाहीन होनेपर भी, वे अपने परमधाम में ले जायँगे ॥ ३१ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः ।
    क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः ।
जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः ।
    कर्माणि चाऽऽत्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६ ॥
तोकेन जीवहरणं यदुलूकिकायाः ।
    त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः ।
यद् रिङ्गतान्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा ।
    उन्मूलनं त्वितरथाऽर्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥

जिस समय झुंड-के-झुंड दैत्य पृथ्वीको रौंद डालेंगे उस समय उसका भार उतारने के लिये भगवान्‌ अपने सफेद और काले केशसे बलराम और श्रीकृष्णके रूपमें कलावतार ग्रहण करेंगे।[*] वे अपनी महिमा को प्रकट करनेवाले इतने अद्भुत चरित्र करेंगे कि संसारके मनुष्य उनकी लीलाओंका रहस्य बिलकुल नहीं समझ सकेंगे ॥ २६ ॥ बचपन में ही पूतनाके प्राण हर लेना, तीन महीने की अवस्था में पैर उछालकर बड़ा भारी छकड़ा उलट देना और घुटनों के बल चलते-चलते आकाश को छूनेवाले यमलार्जुन वृक्षों के बीच में जाकर उन्हें उखाड़ डालना—ये सब ऐसे कर्म हैं, जिन्हें भगवान्‌ के सिवा और कोई नहीं कर सकता ॥ २७ ॥

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 [*] केशों के अवतार कहने का अभिप्राय यह है कि पृथ्वी का भार उतारने के लिये तो भगवान्‌ का एक केश ही काफी है । इसके अतिरिक्त श्रीबलराम जी और श्रीकृष्ण के वर्णोंकी सूचना देने के लिये भी उन्हें क्रमश: सफेद और काले केशों का अवतार कहा गया है। वस्तुत: श्रीकृष्ण तो पूर्णपुरुष स्वयं भगवान्‌ हैं—कृष्णस्तु भगवान्‌ स्वयम्।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

अस्मत्प्रसादसुमुखः कलया कलेश ।
    इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे ।
तिष्ठन् वनं सदयितानुज आविवेश ।
    यस्मिन् विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३ ॥
यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो ।
    मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद् दिधक्षोः ।
दूरे सुहृन्मथितरोष सुशोणदृष्ट्या ।
    तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४ ॥
वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह ।
    दन्तैर्विडम्बितककुब्जुष ऊढहासम् ।
सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तुः ।
    विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरतोऽधि सैन्ये ॥ २५ ॥

मायापति भगवान्‌ हम पर अनुग्रह करनेके लिये अपनी कलाओं—भरत, शत्रुघ्र और लक्ष्मणके साथ श्रीरामके रूपसे इक्ष्वाकुके वंशमें अवतीर्ण होते हैं। इस अवतारमें अपने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये अपनी पत्नी और भाईके साथ वे वनमें निवास करते हैं। उसी समय उनसे विरोध करके रावण उनके हाथों मरता है ॥ २३ ॥ त्रिपुर विमानको जलानेके लिये उद्यत शङ्करके समान, जिस समय भगवान्‌ राम शत्रुकी नगरी लङ्काको भस्म करनेके लिये समुद्रतटपर पहुँचते हैं, उस समय सीताके वियोगके कारण बढ़ी हुई क्रोधाग्निसे उनकी आँखें इतनी लाल हो जाती हैं कि उनकी दृष्टिसे ही समुद्रके मगरमच्छ, साँप और ग्राह आदि जीव जलने लगते हैं और भयसे थर-थर काँपता हुआ समुद्र झटपट उन्हें मार्ग दे देता है ॥ २४ ॥ जब रावणकी कठोर छातीसे टकराकर इन्द्रके वाहन ऐरावतके दाँत चूर-चूर होकर चारों ओर फैल गये थे, जिससे दिशाएँ सफेद हो गयी थीं, तब दिग्विजयी रावण घमंडसे फूलकर हँसने लगा था। वही रावण जब श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी सीताजीको चुराकर ले जाता है और लड़ाईके मैदानमें उनसे लडऩेके लिये गर्वपूर्वक आता है, तब भगवान्‌ श्रीरामके धनुषकी टङ्कारसे ही उसका वह घमंड प्राणोंके साथ तत्क्षण विलीन हो जाता है ॥ २५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

तुभ्यं च नारद भृशं भगवान्विवृद्ध ।
    भावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् ।
ज्ञानं च भागवतमात्मसतत्त्वदीपं ।
    यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९ ॥
चक्रं च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो ।
    मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।
दुष्टेषु राजसु दमं व्यदधात्स्वकीर्तिं ।
    सत्ये त्रिपृष्ठ उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २० ॥
धन्वन्तरिश्च भगवान् स्वयमेव कीर्तिः ।
    नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति ।
यज्ञे च भागममृतायुरवावचन्ध ।
    आयुश्च वेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके ॥ २१ ॥
क्षत्रं क्षयाय विधिनोपभृतं महात्मा ।
    ब्रह्मध्रुगुज्झितपथं नरकार्तिलिप्सु ।
उद्धन्त्यसाववनिकण्टकमुग्रवीर्यः ।
    त्रिःसप्तकृत्व उरुधारपरश्वधेन ॥ २२ ॥

(ब्रह्माजी कहरहे हैं) नारद ! तुम्हारे अत्यन्त प्रेमभावसे परम प्रसन्न होकर हंसके रूपमें भगवान्‌ने तुम्हें योग, ज्ञान और आत्मतत्त्वको प्रकाशित करनेवाले भागवतधर्मका उपदेश किया। वह केवल भगवान्‌के शरणागत भक्तोंको ही सुगमतासे प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ वे ही भगवान्‌ स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरोंमें मनुके रूपमें अवतार लेकर मनुवंशकी रक्षा करते हुए दसों दिशाओंमें अपने सुदर्शनचक्रके समान तेजसे बेरोक-टोक—निष्कण्टक राज्य करते हैं। तीनों लोकोंके ऊपर सत्यलोकतक उनके चरित्रोंकी कमनीय कीर्ति फैल जाती है और उसी रूपमें वे समय-समयपर पृथ्वीके भारभूत दुष्ट राजाओंका दमन भी करते रहते हैं ॥ २० ॥
स्वनामधन्य भगवान्‌ धन्वन्तरि अपने नामसे ही बड़े-बड़े रोगियोंके रोग तत्काल नष्ट कर देते हैं। उन्होंने अमृत पिलाकर देवताओंको अमर कर दिया और दैत्योंके द्वारा हरण किये हुए उनके यज्ञ-भाग उन्हें फिर से दिला दिये। उन्होंने ही अवतार लेकर संसार में आयुर्वेद का प्रवर्तन किया ॥२१॥
जब संसार में ब्राह्मणद्रोही आर्यमर्यादा का उल्लङ्घन करने वाले नारकीय क्षत्रिय अपने नाश के लिये ही दैववश बढ़ जाते हैं और पृथ्वी के काँटे बन जाते हैं, तब भगवान्‌ महापराक्रमी परशुराम के रूपमें अवतीर्ण होकर अपनी तीखी धारवाले फरसे से इक्कीस बार उनका संहार करते हैं॥२२॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

ज्यायान् गुणैरवरजोऽप्यदितेः सुतानां ।
    लोकान् विचक्रम इमान् यदथाधियज्ञः ।
क्ष्मां वामनेन जगृहे त्रिपदच्छलेन ।
    याच्ञामृते पथि चरन् प्रभुभिर्न चाल्यः ॥ १७ ॥
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौचम् ।
    आपः शिखाधृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।
यो वै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्यद् ।
    आत्मानमङ्ग शिरसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥

भगवान्‌ वामन अदिति के पुत्रों में सबसे छोटे थे, परन्तु गुणों की दृष्टि से वे सबसे बड़े थे। क्योंकि यज्ञपुरुष भगवान्‌ ने इस अवतार में बलि के संकल्प छोड़ते ही सम्पूर्ण लोकोंको अपने चरणों से ही नाप लिया था। वामन बनकर उन्होंने तीन पग पृथ्वी के बहाने बलि से सारी पृथ्वी ले तो ली, परन्तु इससे यह बात सिद्ध कर दी कि सन्मार्ग पर चलनेवाले पुरुषों को याचना के सिवा और किसी उपाय से समर्थ पुरुष भी अपने स्थान से नहीं हटा सकते, ऐश्वर्य से च्युत नहीं कर सकते ॥ १७ ॥ दैत्यराज बलि ने अपने सिरपर स्वयं वामन भगवान्‌ का चरणामृत धारण किया था। ऐसी स्थिति में उन्हें जो देवताओं के राजा इन्द्रकी पदवी मिली, इसमें कोई बलि का पुरुषार्थ नहीं था। अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करनेपर भी वे अपनी प्रतिज्ञा के विपरीत कुछ भी करने को तैयार नहीं हुए। और तो क्या, भगवान्‌ का तीसरा पग पूरा करने के लिये उनके चरणों में सिर रखकर उन्होंने अपने आपको भी समर्पित कर दिया ॥ १८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

त्रैविष्टपोरुभयहा स नृसिंहरूपं ।
    कृत्वा भ्रमद् भ्रुकुटिदंष्ट्रकरालवक्त्रम् ।
दैत्येन्द्रमाशु गदयाऽभिपतन्तमारात् ।
    ऊरौ निपात्य विददार नखैः स्फुरन्तम् ॥ १४ ॥
अन्तः सरस्युरुबलेन पदे गृहीतो ।
    ग्राहेण यूथपतिरम्बुजहस्त आर्तः ।
आहेदमादिपुरुषाखिललोकनाथ ।
    तीर्थश्रवः श्रवणमङ्गलनामधेय ॥ १५ ॥
श्रुत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेयः ।
    चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः ।
चक्रेण नक्रवदनं विनिपाद्य तस्माद् ।
    धस्ते प्रगृह्य भगवान् कृपयोज्जहार ॥ १६ ॥

देवताओंका महान् भय मिटानेके लिये उन्होंने नृसिंहका रूप धारण किया। फडक़ती हुई भौंहों और तीखी दाढ़ोंसे उनका मुख बड़ा भयावना लगता था। हिरण्यकशिपु उन्हें देखते ही हाथमें गदा लेकर उनपर टूट पड़ा। इसपर भगवान्‌ नृसिंहने दूरसे ही उसे पकडक़र अपनी जाँघोंपर डाल लिया और उसके छटपटाते रहनेपर भी अपने नखोंसे उसका पेट फाड़ डाला ॥ १४ ॥
बड़े भारी सरोवरमें महाबली ग्राहने गजेन्द्रका पैर पकड़ लिया। जब बहुत थककर वह घबरा गया, तब उसने अपनी सूँड़ में कमल लेकर भगवान्‌ को पुकारा—‘हे आदिपुरुष ! हे समस्त लोकों के स्वामी ! हे श्रवणमात्र से कल्याण करनेवाले !’ ॥ १५ ॥ उसकी पुकार सुनकर अनन्तशक्ति भगवान्‌ चक्रपाणि गरुडकी पीठपर चढक़र वहाँ आये और अपने चक्रसे उन्होंने ग्राह का मस्तक उखाड़ डाला। इस प्रकार कृपापरवश भगवान्‌ने अपने शरणागत गजेन्द्र की सूँड़ पकडक़र उस विपत्तिसे उसका उद्धार किया ॥ १६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा

सत्रे ममाऽस भगवान् हयशीर्ष एव ।
    साक्षात् स यज्ञपुरुषः तपनीयवर्णः ।
छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मा ।
    वाचो बभूवुरुशतीः श्वसतोऽस्य नस्तः ॥ ११ ॥
मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः ।
    क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः ।
विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे ।
    आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२ ॥
क्षीरोदधावमरदानवयूथपानाम् ।
    उन्मथ्नताममृतलब्धय आदिदेवः ।
पृष्ठेन कच्छपवपुर्विदधार गोत्रं ।
    निद्राक्षणोऽद्रिपरिवर्तकषाणकण्डूः ॥ १३ ॥

इसके बाद स्वयं उन्हीं यज्ञपुरुष ने मेरे यज्ञमें स्वर्ण के समान कान्तिवाले हयग्रीव के रूप में अवतार ग्रहण किया। भगवान्‌का वह विग्रह वेदमय, यज्ञमय और सर्वदेवमय है। उन्हींकी नासिकासे श्वासके रूपमें वेदवाणी प्रकट हुई ॥ ११ ॥
चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें भावी मनु सत्यव्रतने मत्स्यरूपमें भगवान्‌को प्राप्त किया था। उस समय पृथ्वीरूप नौकाके आश्रय होनेके कारण वे ही समस्त जीवोंके आश्रय बने। प्रलयके उस भयंकर जलमें मेरे मुखसे गिरे हुए वेदोंको लेकर वे उसीमें विहार करते रहे ॥ १२ ॥
जब मुख्य-मुख्य देवता और दानव अमृतकी प्राप्तिके लिये क्षीरसागरको मथ रहे थे, तब भगवान्‌ने कच्छपके रूपमें अपनी पीठपर मन्दराचल धारण किया। उस समय पर्वतके घूमनेके कारण उसकी रगड़से उनकी पीठकी खुजलाहट थोड़ी मिट गयी, जिससे वे कुछ क्षणोंतक सुखकी नींद सो सके ॥ १३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण द्वितीय स्कन्ध-सातवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  द्वितीय स्कन्ध- सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९) भगवान्‌ के लीलावतारों की कथा भूमेः सुरेतरवरूथविमर्द...