॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
प्रथम
स्कन्ध--नवाँ अध्याय..(पोस्ट ०४)
युधिष्ठिरादिका
भीष्मजीके पास जाना और भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति
करते
हुए भीष्मजीका प्राणत्याग करना
न
ह्यस्य कर्हिचित् राजन् पुमान् वेद विधित्सितम् ।
यत्
विजिज्ञासया युक्ता मुह्यन्ति कवयोऽपि हि ॥ १६ ॥
तस्मात्
इदं दैवतंत्रं व्यवस्य भरतर्षभ ।
तस्यानुविहितोऽनाथा
नाथ पाहि प्रजाः प्रभो ॥ १७ ॥
एष
वै भगवान् साक्षात् आद्यो नारायणः पुमान् ।
मोहयन्
मायया लोकं गूढश्चरति वृष्णिषु ॥ १८ ॥
अस्यानुभावं
भगवान् वेद गुह्यतमं शिवः ।
देवर्षिर्नारदः
साक्षात् भगवान् कपिलो नृप ॥ १९ ॥
(भीष्मपितामह
कह रहे हैं) ये कालरूप श्रीकृष्ण कब क्या करना चाहते हैं, इस बात को कभी कोई नहीं जानता। बड़े-बड़े ज्ञानी भी इसे जाननेकी इच्छा
करके मोहित हो जाते हैं ॥ १६ ॥ युधिष्ठिर ! संसारकी ये सब घटनाएँ ईश्वरेच्छा के
अधीन हैं। उसीका अनुसरण करके तुम इस अनाथ प्रजाका पालन करो; क्योंकि
अब तुम्हीं इसके स्वामी और इसे पालन करनेमें समर्थ हो ॥ १७ ॥ ये श्रीकृष्ण
साक्षात् भगवान् हैं। ये सबके आदि कारण और परम पुरुष नारायण हैं। अपनी मायासे
लोगोंको मोहित करते हुए ये यदुवंशियों में छिपकर लीला कर रहे हैं ॥ १८ ॥ इनका
प्रभाव अत्यन्त गूढ़ एवं रहस्यमय है। युधिष्ठिर ! उसे भगवान् शङ्कर, देवर्षि नारद और स्वयं भगवान् कपिल ही जानते हैं ॥ १९ ॥
शेष
आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्ट संस्करण) पुस्तक कोड 1535 से

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